*" प्राण टुकु अटक्यां छन "*
गजल़
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हमरा- सोऽर जगा- जऽगौं, भटक्यां छन।
जम्ना हवा देखि,*प्राण टुकु अटक्यां छन*।।
ठौ- ठिकणां फरि नि रै, ज्यू- ज्यान कैकि,
करज-लेकि-खै-पेकि, अफी नड़क्यां छन।।
अधकचा ज्ञाना, ज्ञानि-सभि बड़िगीं यख,
दिल-दिमाग, कांच माफिक चटक्यां छन।।
कख-क्य हूंणू- क्य होलु, चास- भास रैंद,
भैनै हाँ- हाँ, भित्नै- दिमाग सटक्यां छन।।
चारदिन घैर-आठ बूंण, ह्वे आंणि- जांणी,
न-इनैका न-उनैका, बीचम- लटक्यां छन।।
पांच-दस-बारा कैरि, बूंण जांणा मर- मर,
संगाड़ौं बटि चूऴ-द्वार, जन-छटग्यां छन।।
'दीन' कुछ- हमरि सूंणा, हम-जनै द्याखा,
घैनै करा सोऽर, *प्राण टुकु अटग्यां छन*।।

@ दीनदयाल बन्दूणी 'दीन'
१४०४२०२३
जोगीमढ़ी, बटि..