
Dindayal Bandooni
गज़ल
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*" आस-विश्वास बणैं रखण "*
क्य कन- क्य नि कनु-सब भूलिगीं,
गुमसुम हुयां- अप्णा हि ख्यालम।।
चंचल ज्यूकु- एक ठिकणु- कख रै,
सयूं-२ जांणूं-यीं डाऴम वीं डाऴम।।
सुधमत नि रैगे- कै फरि अजकल्यूं,
लगणूं इनु- जन अयीं गाऴ-गाऴम।।
आपसि मेल- मिलाप बि- कख रैगे,
बुलैकि बि-नि आंणु तैला ख्वाऴम।।
भरम कु जाऴ फैल्यूं ज्यूम सबका,
रंदीं-कै काम-काज करणां टाऴम।।
'दीन' आस-विश्वास बणैं कि रखण,
नि बैठा मुख फरकै- चौक-थाऴम।।
@ दीनदयाल बन्दूणी 'दीन'
जोगीमढ़ी, बटि..
PUBLICED BYउत्तराखंड की लगूली
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